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उपराष्ट्रपति ने कहा, मानव तस्करी एक सामाजिक बुराई है
August 1, 2019 • Admin

रिपोर्ट : अजीत कुमार

 

 

उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने सरकारी एजेंसियों, नागरिक समाज और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) का आह्वान करते हुए कहा है कि मानव तस्करी के खिलाफ ठोस, कठोर और अनवरत ढंग से लड़ाई को और तेज़ करने के लिए अपने प्रयासों में समन्वय करें। उन्होंने विचार रखा कि मानव तस्करी के खिलाफ युद्ध को तब तक जारी रखना होगा जब तक इसका आखिरी पीड़ित बचा नहीं लिया जाता, उसका पुनर्वास नहीं कर दिया जाता और इसके आखिरी दोषी को सजा नहीं दिला दी जाती।

डॉ. सुनीता कृष्णन और उनके एनजीओ 'प्रज्जवला' द्वारा यौन तस्करी के पीड़ितों के घरों के गृह प्रबंधन के लिए तैयार की गई प्रशिक्षण पुस्तिका आज हैदराबाद में जारी करने के बाद आयोजन में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि मानव तस्करी केवल एक सामाजिक बुराई नहीं है बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा वह मानवता के ही खिलाफ एक हिंसक अपराध है। उन्होंने सुझाव दिया कि लोगों की बेहतर समझ के लिए इस प्रशिक्षण पुस्तिका का अनुवाद स्थानीय भाषाओं में भी किया जाए।

उन्होंने कहा, “मानव तस्करी एक ऐसा खतरा है जो मानव अधिकारों, न्याय, गरिमा के सभी बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और इसे अकसर आधुनिक काल की गुलामी कहा जाता है”।

उनका कहना था कि जो मूल अधिकार हमारे संविधान की आधारशिला निर्मित करते हैं वे प्रत्येक नागरिक के आज़ादी के निर्विवाद अधिकार और शोषण व सभी प्रकार के जबरदस्ती के श्रम, बाल श्रम और तस्करी के खिलाफ अपरिहार्य अधिकार की गारंटी देते हैं।

हमारे देश के हर नागरिक के पास एक सुरक्षित और सम्मान भरा जीवन जीने का अधिकार होना चाहिए यह मत रखते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि हमारा संविधान हरेक नागरिक को ये पवित्र दायित्व देता है कि वो मानव तस्करी को मिटाने के लिए कड़ी मेहनत करें।

उन्होंने कहा, “हमारे पूरे समाज को इस कार्य के लिए एकजुट होना चाहिए। इस अपराध की प्रकृति के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए हमें अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना चाहिए और पीड़ितों को बचाने और उनका पुनर्वास करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए”।

नायडू ने लोगों को प्रोत्साहित करने का आह्वान किया कि वे मानव तस्करी से बचने वाले पीड़ितों को सामान्य जीवन जीने और समाज की मुख्यधारा में फिर से जुड़ने के लिए अपना समर्थन और मदद दें।

तस्करी में बचने वालों को विभिन्न सेवाएं प्रदान करने वाले हितधारकों के लिए पीड़ितों और तस्करी से उन पर होने वाले असर को समझना सर्वाधिक महत्व की बात है, यह कहते हुए उपराष्ट्रपति ने राय रखी कि सभी हितधारकों को पीड़ितों की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, वित्तीय और आध्यात्मिक सेहत पर उनके साथ हुई हिंसा, क्रूरता, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न से पड़ने वाले असर को पहचानना चाहिए।

नायडू ने कहा कि तस्करी से बचे पीड़ित स्वस्थ हो पाएं और सामान्य जीवन जी सकें इसके लिए एक सक्षमकारी और मददगार तंत्र का बनाया जाना और पीड़ितों को शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार के नए रास्ते मुहैया करवाना सबसे महत्वपूर्ण बात है।

उन्होंने कहा, “बाल पीड़ितों के मामले में विशेष ख़याल रखे जाने की जरूरत है क्योंकि जिस सदमे और आघात से वे गुजरे हैं वो बहुत ज्यादा होगा। उनकी पूरी रिकवरी हो सके इसके लिए उन्हें ऊंचे स्तर की देखभाल चाहिए होगी”।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि इनकी देखभाल और हिफाज़त के लिए बनाए गए सुरक्षा गृह ऐसे गंभीर अत्याचारपूर्ण हालातों से आने वाले पीड़ितों के समग्र पुनर्वास के लिए एक सक्षमकारी माहौल पैदा करने के मामले में गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, “जब पीड़ितों को शोषणकारी स्थितियों में से बचाया जाता है और वे ऐसी हिंसा के नतीजतन गंभीर प्रभावों से पीड़ित होते हैं, तब अपने पूर्ण पुनर्वास की दिशा में उनकी पहली और सबसे आवश्यक जरूरत एक सुरक्षित जगह और आश्रय की होती है”।

प्रज्जवला के प्रयासों को अपना समर्थन देने और प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से उपराष्ट्रपति ने अपनी एक महीने की तनख्वाह इस संगठन को देने की घोषणा की जो मानव तस्करी के पीड़ितों की देखभाल करता आ रहा है।

इससे पहले उपराष्ट्रपति ने मानव तस्करी पर एक प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।

महिला एवं बाल कल्याण राज्य मंत्री देबाश्री चौधरी, प्रज्जवला एनजीओ की संस्थापक डॉ. सुनीता कृष्णन और अन्य गणमान्य लोग भी इस अवसर पर उपस्थित थे।