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आईएफएफआई में अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों के निर्देशक प्रेस से मिले
November 21, 2019 • Admin

 

 

 

सिनेमा केवल मनोरंजन के बारे में नहीं होता है। यह मस्तिष्क को छूने, संदेशों को पहुंचाने और सामाजिक परिवर्तन लाने के बारे में भी है। 50वें भारत अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में दिखाई जाने वाली दो अंतर्राष्ट्रीय फिल्में 'ओरे' तथा 'इंटरडिपेंडेंस' यही भाव व्यक्त करती हैं।

फिल्म के बारे में अपने विचार साझा करते हुए जर्मन-तुर्की फिल्म निर्देशक तथा पटकथा लेखक मेहमेत अकीफ बुयूकताले ने कहा, 'ओरे' फिल्म व्यक्तिगत और सांस्कृतिक पहचान की खोज के बारे में है।

अपनी पहली फिल्म प्रस्तुत करने में आई बाधाओं की याद दिलाते हुए मेहमेत ने कहा कि सबसे कठिन काम फिल्म के लिए वित्तीय समर्थन हासिल करना था। जर्मनी में तुर्की मूल के कलाकारों को पाना भी कठिन था, क्योंकि अधिकतर तुर्की अभिनेता टेलीविजन में काम कर रहे हैं। टेलीविजन का स्वरूप घिसा-पिटा होने से तुर्की और मुसलमान अभिनेता हमेशा आतंकवादियों और अपराधियों की भूमिका निभाते हैं।

जर्मनी और भारत में इस्लाम के व्यवहार में अंतर के बारे में उन्होंने कहा कि यूरोप में जो इस्लाम है, वह एक तरह का 'यूट्यूब इस्लाम' है, क्योंकि नई मुस्लिम पीढ़ी धर्म को इंटरनेट के माध्यम से सीख रही है।

फिल्म 'इंटरडिपेंडेंस' के 11 निर्देशकों में एक नील माधब पांडा ने कहा कि यह फिल्म जलवायु परिवर्तन के भावात्मक प्रभाव की बात करती है। यह दिल्ली में एक परिवार की कहानी है, जो शहर में गंभीर प्रदूषण के कारण तलाक के दौर से गुजरता है। इस फिल्म की सोच संवाद कायम करना है, ताकि समस्या को समाप्त करने के लिए कुछ उपायकारी कदम उठाए जा सकें।

उन्होंने कहा कि यद्पि सरकार और अनेक संगठन वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इसके बारे में सबसे पहले दिल्ली के लोगों को निर्णय लेना होगा। उन्होंने जलवायु परिवर्तन के कारण लोगों के संबंधों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर अपना व्यक्तिगत अनुभव सुनाया।

जर्मन-तुर्की फिल्म निर्देशक तथा पटकथा लेखक मेहमेत अकीफ बुयूकताले की फिल्म 'ओरे' तीन तलाक के विषय के इर्दगिर्द घुमती है। फिल्म का नायक ओरे बेहतर व्यक्ति बनने की कोशिश करता है, लेकिन उसे अपने धूंधले अतीत का सामना करना पड़ता है। अच्छा मुसलमान और अच्छा पति होने का उसका सपना अपनी पत्नी से विवाद करते समय अचानक चकनाचूर हो जाता है। ओरे कोलेन जाता है, जहां वह नये मुस्लिम समुदाय में अपने जीवन को फिर से बनाने का प्रयास करता है। लेकिन वह निरंतर अपने धर्म, दैनिक यथार्थ और पहचान के बीच जूझते रहता है।

निर्देशक ने एक व्यक्ति की कहानी कहने के लिए अर्ध-वृत्तचित्र शैली अपनाई है। कहानी का नायक धर्म की जटिल मान्यता प्रणाली के बीच काम करते हुए प्यार तथा धर्म के प्रति अपने प्यार में फंसे मानव के रूप में स्वयं को थका देता है। यह फिल्म 2019 के बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में दिखाई गई और वहां इसे 'बेस्ट फस्ट फीचर अवार्ड' मिला। आईएफएफआई 2019 में यह फिल्म आईसीएफटी-यूनेस्को गांधी पदक श्रेणी में स्पर्धा कर रही है।

यह अनूठी फिल्म विश्व के अंतर्राष्ट्रीय रूप से मान्य 11 फिल्मकारों की फिल्म है। इंटरडिपेंडेंस में मानव समाज और जलवायु परिवर्तन से प्रभावित प्राकृतिक वातावरण में गुथे हुए संबंधों को विभिन्न आयामों से दिखाया गया है। फिल्म में संभव समाधान की भी बात की गई है। 2018 में शुरू हुई यह फिल्म परियोजना मानव और प्रकृति की स्थिति की विवेकपूर्ण और सृजनात्मक तरीके से खोज करती है।

फिल्म के 11 निर्देशकों में एक नील माधब पांडा ने 70 से अधिक फिल्मों, वृत्तचित्रों तथा लघु फिल्मों को जलवायु परिवर्तन, बालश्रम, शिक्षा, जल और स्वच्छता जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक विषयों पर बनाया है। नील की पहली फीचर फिल्म 'आई एम कलाम' को राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ 34 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। उनकी दूसरी फीचर फिल्म 'जलपरी' को कान्स में एमआईपी जूनियर पुरस्कार मिला।