ALL TOP NEWS INDIA STATE POLITICAL CRIME NEWS ENTERTAINMENT SPORTS CONTACT US
फिल्म निर्वाण में रामकृष्ण परमहंस की शिक्षा “जोतो मोत तोतो पोठ” को दिखाया गया है : फिल्मकार गौतम हलदर
November 28, 2019 • Admin

 

 

 

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता बांग्ला फिल्म निर्देशक गौतम हलदर ने गोवा के पणजी में आईआईएफआई, 2019 को अपनी फिल्म निर्वाण की जानकारी गोवा में संवाददाताओं को दी। यह फिल्म पूर्वाग्रहों से ऊपर उठने और निर्वाण प्राप्त करने के बारे में हैं। गौतम हलदर ने कहा कि आज के वैश्विकरण के युग में खराब मान्यताओं ने अंधा नर्क बना दिया है। शक्ति की लालच बढ़ गई है और हिंसा का माहौल है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इस खराब परिस्थिति से निपटने का ऊपाय चेतन में बसा है। इसलिए हम सभी को अपने आसपास के माहौल को देखना चाहिए।

आईआईएफआई में अपनी फिल्म को मिल रही प्रतिक्रिया के बारे में हलदर ने कहा कि मैं बहुत अधिक प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं रखता था। मैंने कुछ बांग्ला तथा कुछ अन्य अंतर्राष्ट्रीय निर्देशकों से बातचीत की है और यह काफी बढ़ा अनुभव रहा है। उन्होंने फिल्म के चयन के लिए आयोजकों के प्रति आभार जताया।

स्वयं वृत्तचित्र निर्माता रहे हरदर ने कहा कि मैं हमेशा से वृत्तचित्र फिल्मों का पक्षधर हूं। फिल्मकार के लिए सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार दर्शक की प्रतिक्रिया है। मैं किसी पुरस्कार की उम्मीद नहीं रखता, लेकिन दर्शक की स्वीकार्यता की उम्मीद करता हूं।

उन्होंने कहा कि वृत्तचित्र भारतीय गांव में दिखाए जाते हैं। इससे फिल्म संस्कृति विकसित करने में मदद मिलेगी। यह बहुत खर्चीला कार्य नहीं है और हमें इसके बारे में सोचना चाहिए। यह फिल्म बांग्ला और हिन्दी में बनाई गई है।

नोबल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी पर आधारित गैर-फीचर फिल्म सत्यार्थी के निर्देशक पंकज जौहर ने कहा कि मैं सत्यार्थी को उनके नोबल पुरस्कार प्राप्त करने के पहले से जानता हूं। मैं किसी और फिल्म पर शोध कर रहा था, लेकिन बाल श्रम पर वृत्तचित्र की चर्चा प्रारंभ हो गई।

यह फिल्म सत्यार्थी की यात्रा के बारे में है और किस तरह वे फिल्म में बच्चों को बचाते हैं।

पंकज जौहर ने कहा कि मैंने उनके संगठन से भी मदद ली। बाल श्रम की कुप्रथा में धकेले गए अधिकतर बच्चे ओडिशा, झारखंड, बिहार तथा उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों के हैं। यौन तस्करी मुख्य रूप से पूर्वोत्तर तथा बंगाल से की जाती है। लड़कियां हरियाणा में तथा दक्षिण के शिवकाशी में बेची जाती हैं।

अभिभावक नहीं जानते कि उनके बच्चों के साथ क्या हो रहा है और बच्चों को झूठे वादों से लुभाया जाता है। उन्हें स्थिति की वास्तविकता कभी नहीं बतायी जाती।