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सुख-दुख से ऊपर उठ कर आनंद में जीवन जीने का नाम है भक्ति - सद्गूरू माता सुदीक्षा जी महाराज
November 18, 2019 • Admin

रिपोर्ट : अजीत कुमार

 

 

“सुख-दुख से ऊपर उठ कर सहज अवस्था में आनंदमय जीवन जीने का नाम ही भक्ति है । भक्ति में ब्रह्मज्ञान द्वारा आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है। सत्य की पहचान से हमारे मन का अहंकार समापत हो जाता है और हर किसी के अंदर परमात्मा का नूर नज़र आने लगता है”। ये उद्गार निरंकारी सद्गुरु माता सुदीक्षा महाराज ने 3-दिवसीय 72वें वार्षिक निरंकारी सन्त समागम के पहले दिन खुले सत्र में लाखों की संख्या में उपस्थित विशाल मानव परिवार को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए। इस समागम में भारत के कोने-कोने से तथा दूर-देशों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु भक्तों ने भाग लिया है।

सद्गुरु माता ने कहा कि सत्य के बोध के बाद जब हम अपने हर कार्य में निरंकार प्रभु के अहसास को शामिल कर लेते हैं और शुकराने के भाव को अपना लेते हैं तो वह भी भक्ति बन जाता है और हमें निरंतर आनंद की अवस्था प्राप्त होती है |

समागम के मुख्य विषय सन्त निरंकारी मिशन के 90 सालों के दीप्तिमान इतिहास पर रौशनी डालते हुए सद्गुरु माता ने कहा कि मिशन के प्रारंभिक संदेशवाहकों ने दुनियावी साधनों के अभाव तथा विपरीत परिस्थितियों में भी दृढ संकल्प के साथ मानव कल्याण के प्रति अपना जीवन समर्पित किया। पुरातन युगों में जो सत्य, प्रेम, एकत्व का संदेश दिया गया वही संदेश आज भी यह मिशन आगे बढ़ा रहा है। जीवन तभी सार्थक बन सकता है जब वह सत्य की रोशनी में लिया जाए।

मिशन के अनुयायियों का आह्वान करते हुए सद्गुरु माता जी ने कहा कि मिशन द्वारा दी जा रही सिखलाई हमारे जीवन का व्यावहारिक अंग बन जाए। हम अपने उज्ज्वल जीवन द्वारा ही इस सच्चाई को हर मानव तक पहुंचाने का यत्न करें।

समागम के दूसरे दिन का कार्यक्रम एक भव्य सेवादल रैली से शुरु हुआ जिसमें देश भर से आए हुए सेवादल के हजारों बहन भाईयों ने अपनी वर्दी पहन कर भाग लिया। दूर देशों से आए हुए सेवादल ने भी अपनी वर्दी पहन कर इस रैली में भाग लिया। सेवादल ने सेवा को ईश्वर और सद्गुरु के प्रति भक्तिभाव प्रकट करने के प्रभावी साधन के रुप में दर्शाया।

सेवादल रैली को सम्बोधन करने आये सद्गुरु माता सुदीक्षा महाराज स्वयं सेवादल की वर्दी पहने हुए थे और उन्होंने प्रार्थना गीत में भी भाग लिया। अपने आशीर्वाद में सद्गुरु माता जी ने कहा कि मिशन के शुरु के वर्षों से ही सेवादल अपनी सेवाओं को निभाता आ रहा है। सेवादल की वर्दी केवल वस्त्र का रुप नहीं होती। यह जहां हमारी शोभा बढ़ाती हैं वहां उसकी अपनी एक मर्यादा भी है। वर्दी के साथ साथ सेवा का भाव भी मन में होना जरुरी है। सेवा चेतन होकर की जाती है। सेवादल वर्दी में हमारी जिम्मेवारी बढ़ जाती है। हम अपने अहंकार को दूर कर और बोलों में मिठास रखते हुए अपनी सेवायें निभायें।

इस अवसर पर संत निरंकारी मंडल के उपाध्यक्ष तथा सेवादल के मेंबर इंचार्ज वी.डी.नागपाल जी ने सेवादल के भाई-बहनों के लिए सद्गुरु माता से आशीर्वादों की कामना की। आपने कहा कि बोलों से अधिक कर्म शक्तिशाली होता है। सेवादल अपने योगदान द्वारा समाज में एक मिसाल कायम करें और एक एक श्वांस मानवता की सेवा में मिशन की सिखलाई के अनुसार लग पाए।